Sunday, 21 February 2016

जाति के नाम पर देश को तोडना चाहतें हैं कुछ लोग ....कौन हैं वे

ये सभी मित्र हैं जो हर कैटेगरी के हैं लेकिन किसी के मन में कोई भेदभाव नहीं। और सभी संस्कृत के छात्र हैं।
रामजस महाविद्यालय में मेरे कुछ  मित्रों का असि् प्रोफेसर (संस्कृत) पद के लिये साक्षात्कार चल रहा था।मेरा भी मन किया कि चलो अपने मित्रों से मिला जाय। जब मैं वहाँ गया तो तब तक लंच हो चुका था तो सभी अभ्यर्थी खाने के लिये कैन्टीन मे चले गये। मैं भी अपने मित्रों के साथ चला गया। पहले तो मैने उनके साथ गाजर का जूस पिया फिर सभी ने पास्ते की दो प्लेट ले ली। अब प्लेट दो थी और हम पाँच। जिसमें तीन एस. सी. कैटेगरी से थे और एक एस.टी. से और एक सामान्य से। सभी दोनों प्लेटों में अपनी अपनी चम्मच से खा रहे थें। सभी को सभी की कैटेगरी अथवा जाति का पता था फिर भी वे एक ही प्लेट में एक साथ खा रहे थें। तभी मन में आया कि शिक्षा ही वह साधन है जो सभी को एक कर सकती है बशर्ते वो जोडने वाली शिक्षा हो न कि तोडने वाली।
समाज को तोडने वाले किसी भी छोटी सी गाँव की या शहर की भी जातिगत घटना को बहुत बढा चढाकर वर्णन करेंगे और उनके बीच में वर्णन करेंगे जो इन सब को नहीं मानतें। वे तथाकथित समाजसेवी ये दिखाना चाहते है कि हम समाज से छुआछुत और जाति मिटाना चाहते है और उनका तरीका है कि जो जाति को नहीं मानता वे भी इस बात के लिये लिये लडें कि उनकें पूर्वजों के साथ दूसरी जाति के लोगों ने बहूत अन्याय किया है अत्याचार किया है। अब कोई उन्हें समााझाएँ कि लडनें से प्यार नहीं मिलता। लडनें से सम्मान नहीं मिलता। लडनें से दूरीयाँ कम नहीं होती। लडनें से केवल और केवल नफरत पैदा होती है प्यार नहीं।
यदि समाज को जोडने का ही काम करना है तो फिर उपर का जो उदाहरण दिया है रामजस महाविद्यालय का , उसे ले जाकर गाँवों में या फिर उन शहरवासियों के बीच में बताया जाय कि देखो आज समाज कितना बदल रहा है सभीजाति के लोग  पढ सकते हैं, सभी पढेंगें तो फिर समाज से दूरियाँ मिटेंगी। और वे दूरियाँ इस प्रकार से मिटेंगी जिस प्रकार से देखो दिल्ली में वे साथ रहते हैं।
यदि समाज में हम सकारात्मता फैलायेंगें तो समाज में सकारात्मकता फैलेंगी और यदि नाकरात्मकता फैलेगी।
अब तय उन्हें करना है जो जाति के नाम पर एक दूसरे को लडवा कर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकना चाहतें है कि वे समाज के टुकडें करना चाहतें है या फिर जोडना।
यदि इस देश को हम अपना घर मानते हैं तो फिर क्या हम इसमें समानता प्यार सम्मान रूपी फूल फैलाना चाहतें हैं या फिर द्वेष, नफरत, रूपी गन्दगी फैलाना चाहते हैं।
यदि घर में गन्दगी भी हो तो भी हम उसे साफ करतें हैं उसे फैलाते नहीं।
देश हमारा है ये घर हमारा है तय हमें करना है कि हमें ये फूलों की तरह महकाना है या फिर इसमें गन्दगी को फेलाकर गन.दा करना है।
मेरे वे दोस्त समझ गये होंगे जिनके विषय मे मैने ये घटना लिखी है। 

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